Monday, 17 July 2017

दादी मां की यादें

अम्मा(मेरी दादी मां).. पता है आज आपको गये हुये पूरे 5 साल हो गये..बार बार कहता रहा कि मेरे सपने में आ जाओ.. कहां हो, किस हालात में हो? कुछ तो बता जाओ.. मैं ज़िंदा हूं लेकिन जान आपमें अटकी है. लेकिन आपनें कसम खा रखी है ना आने की.. बीवी के सपने में आकर मेरे हाल चाल लेती हो.मेरा ध्यान रखने की बात करती हो.. लेकिन जो बुला रहा है उसके पास नहीं आने की ठीक वैसे ही जिद है आपकी जैसी खाना ना खाने की जिद्द आप तब करती थी घर में जब मां मेरी डांट लगाती थी..अब तो बड़ा हो गया हूं मैं अब मां भी नहीं डांटती हैं अब तो आप मजे से बिना घर वालों पर गुस्सा किये रह सकती थी.. लेकिन नहीं आपको तो बहुत जल्दी थी जाने की.. अरे एक बार आकर तो देखो अब मेरी शादी हो गई है बहुत सपने सजाये थे ना आपने मेरी शादी के, आपकी बहू आ गई है घर पर.. और हां आपको बचपन में वादा किया था ना मैनें बड़ी सी सोने की चैन देने का.. हां अब मैं दे सकता हूं लेकिन किसे दूं?  आपको घर की चौथी पीड़ी देखनी थी दीदी के बेटा भी हो गया है.. सब अच्छा है, सब कुछ तो है लेकिन अब आप ही नहीं हो तो सब कुछ होने के बाद भी कुछ कमी सी लगती है हमेशा.. सच बताऊं आपको.. घर अभी भी जाता हूं मैं, मां पापा का प्यार भी मिलता है लेकिन अब वो मजा नहीं आता घर में आपके बिना..घर के हर कोने में आपको ढूंढता रहता हूं. ऐसे ही यादें ताजा करके मन को बहला लेता हूं. लोग बहुत मैच्योर समझते हैं मुझे तभी याद आने पर साइड में जाकर सुबकता रहता हूं(रोने पर साफ दिल वालों को आजकल लोग कमजोर समझ लेते हैं अम्मा).  अरे जब मेरे पास नहीं रहना था हमेशा तो मुझे इतना प्यार क्यों किया? बताओ? दूसरी दुनिया में जाकर खुश होने का मतलब ये नहीं होता कि आप अपने लकी को भूल जाओ...गुस्सा बहुत हूं मैं आपसे लेकिन आपकी बहुत याद आती है अम्मा..आपके प्यार के आगे गुस्से की कोई अहमियत नहीं.   जिंदगी अधूरी है आपके बिना.. लव यू अम्मा... वापस तो आ जाओ... सीने से लगा जाओ... 😿😿

Tuesday, 4 July 2017

लड़कों की भी विदाई होती है जनाब

लड़कियों के घर छोड़ने पर दुनिया बड़ी बड़ी बातें करती है .प्यार लुटाया जाता है इमोशन का सैलाब आता है .मुझे उससे कोई शिकायत भी नहीं है क्योंकि ये लगाव की वजह से होता है और सबके साथ होता है ,मेरे साथ भी. लेकिन लड़के भी घर छोड़ कर जाते हैं जनाब बल्कि लड़के तो जल्दी घर छोड़ देते हैं क्योंकि पढ़ाई का बीड़ा और बाद में घर संभालने की जिम्मेदारी की वजह से अच्छी नौकरी का प्रेशर..लेकिन उस मां से पूछो जिसने पैदा होने के बाद कभी सपने में भी अपने लाडले को अपने से दूर नहीं  जाने दिया , अपने बेटे को हर पल निहारने में उसे सुकून मिलता था. घर में रह कर बेटा अगर देर शाम कोचिंग से आने में लेट हो जाये तो मां को चैन नहीं आता था जब तक बेटा आ ना जाये. दादी के आंखों का तारा जो रोज उनके साथ सोता था और दुनिया भर की बातें करता था . बाबा जो रोज शाम को अपने पास बैठने को कहते थे.  पापा जो शाम को घर आते ही पूछते थे कि मेरा बेटा नजर नहीं आ रहा है.  उस बेटे को परिवार वाले ना चाहते हुये भी दिल पर पत्थर रखकर बाहर भेज देते हैं.  बेटा कुछ दिन शुरुआत के बहुत मुश्किल से गुजारता है और फिर परदेश में अपना दिल बहलाने की असफल कोशिश करने लगता है.  मैं गारंटी के साथ कह सकता हूं अगर लड़का बिगड़ा हुआ ना हो तो वो हमेशा अपने घर में अपने के बीच ही रहना चाहता है हमेशा.. और जो बिगड़े हुये भी है वो भी कभी कभी तो जरूर बेचैन होते होंगे अपनों के लिये. मुझे याद है कि जब मैं गया था पहली बार घर से बाहर पढ़ने कि लिये तो दादी जाते टाइम अपने आंसू पोछते हुये  खूब प्यार करती थी.  मेरी मां छुप छुप कर रोती थी. पापा अपने आप को जबरदस्ती सख्त दिखाते थे.  और मैं इस वजह से कभी पीछे मुड़कर नहीं देखता था जाते टाइम की अगर घर वालों को देख लिया तो जिन आंसुओं पर मुश्किल से कंट्रोल करके रखा है वो निकल जा़येंगे और मैं कमजोर पड़ जाऊंगा . आज मैं अपने आप को एक दशक से ज्यादा समय से बाहर रहते रहते कुछ  मजबूत कर पाया हूं . शायद घर वालों को भी अब आदत पड़ ही गई होगी मुझसे दूर रहने की.  लेकिन आज भी जब घर जाता हूं तो वापस आने का मन नहीं करता. अब मेरे छोटे भाई लोग बाहर जा रहे हैं अपने भविष्य के बोर्ड पर अपने दिमाग की चॉक से लिखने के लिये.. तो मुझे अपने दिन याद आ रहे हैं. उम्मीद भी उनके बेहतर करने की है और दुआ भी...
लेकिन एक अच्छी बात भी मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं कि घऱ,प्यार,परिवार ,अपनापन, इमोशन सबके जिंदगी में बहुत मायने हैं लेकिन जिंदगी में आगे बढ़ने के लिये लड़कों को अपने आप को मजबूत करके लड़कियों की तरह घर से समय रहते विदा ले लेनी चाहिये..

Monday, 3 July 2017

जून की छुट्टी की हो गई छुट्टी

जून में अक्सर मुझे बचपन की गर्मियों की छुट्टियाँ याद आती हैं. सब बुआ और बच्चे घर आते थे. उसके बाद हम नानी के और मासी के घर जाते थे. मम्मी को बैलेंस बनाना पड़ता था दोनों तरफ बराबर समय देने के लिये.. हमारे मजे थे, पढने की कोई टेंशन नहीं रहती थी. मम्मी रिश्तेदारों के साथ व्यस्त और हम सब बच्चे खेलने में मस्त.  बस गर्मियों की छुट्टियाँ ही तो थी जब हम खूब सारे बच्चे मिलकर खूब मस्ती करते थे. एसी नहीं थे ज्यादा लाइट नहीं थी. लेकिन बचपन की उमंग थी तो आज से ज्यादा खुश थे. अब मेरे पास भी टाइम ज्यादा नहीं है और रिश्तेदारों के पास भी नहीं. मुझे लगता है 2-4 लोगों के अलावा अब रिश्ते भी औपचारिकता रह गये हैं. बाकी सब बड़े होते ही अपनी लाइफ में व्यस्त हो गये हैं. बाकी दूसरों की बात क्या करूं अब तो हालत ये है कि जॉब की वजह से मुझे खुद घर वालों से दूर रहना पड़ रहा है. अभी मां और दीदी आये थे मेरे पास कुछ दिन के लिये. थोड़ा सा गर्मियों की छुट्टी का अहसास दिला कर गये हैं. लेकिन अब घर सूना है. पूरा दिन भांजे के पीछे भागने भागते निकलता था अब मेरे और बीवी के अलावा कोई बात करने वाला भी नहीं. यही हालत तब होती थी जब रिश्तेदार छुट्टी के बाद वापस जाते थे.  लेकिन तब तक मस्ती का पैकेज कंपलीट हो जाता था. आज की तरह नहीं कि बस 4 दिन के लिये आये और वो 4 दिन भी इधर उधर घूमने में निकल गये. पता नहीं लोग क्यों अकेले रहना चाहते हैं अब? पेट की ख़ातिर करने वाली जॉब में भी गर्मियों की छुट्टियाँ सबको मिलनी चाहिये. फिर शायद हम सब जून में एक साथ रह पायें.अब बचपन नहीं है. जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ रहा है. लेकिन फिर भी साथ रहने का मजा कुछ और ही होगा...