Tuesday, 2 November 2021

बचपन की दीवाली

अरे संभल कर कहीं नसेनी ( लकड़ी की सीढ़ी) गिर ना जाये, अच्छा सुनो उसे कुछ खाने को दे देना, बहुत काम पड़ जाता है, सही से करो भैया देखो उस कोने में रह गया, और हां सुनो छींटे जमीन में नहीं गिरने चाहिये, सारा टाइम सफाई में निकल जायेगा तो मिठाई कब बनायेंगे, ये सुनते सुनते ही और घरों की दीवारों पर कलई चूने की सफेद पुताई ( वो दौर पेंट वाला नहीं था) होते होते दीवाली आ जाती थी, मैं सोचता था ये काम कितना आसान है, कितना मजा आता होगा दीवारें रंगने में. लेकिन बाद में सच्चाई पता चली जब बाबा बोले कूंचा (जिससे पुताई होती थी) चलाना बच्चों का खेल नहीं. वर्ना मजदूरों के खाना खाते वक्त कई बार खुद हाथ आजमाने का मन हुआ था..
पुताई के बाद सफाई, ये बिना लिखा हुआ नियम था हर घर में जिसे हर साल फॉलो करना होता था, सफाई क्या, सफाई के नाम पर पुरानी चीजें निकाल कर उन्हें देखने का, आज़माने का और ऊब जाने पर फेंक देने का शौक था, इधर सफाई का टाइम आया और उधर बाहर से आवाज़ आने लगती थी कबाड़ी वाला.... कबाड़ दे दो.... कबाड़ी वाला... 
उन्हें भी पता था कि घर-घर में सफाई हो रही है, कबाड़ निकलेगा. सच तो ये है कि कबाड़ हम अपने घरों में जमा करे बैठे थे, हम थे कबाड़ी वाले.. वो तो बेचारा हमारी मदद कर रहा था घर के कबाड़े को निकालने में.. 
खैर, मम्मी-पापा के दीवाली के अपने टारगेट थे, और हम बस इसलिये खुश होते थे कि खूब सारी मिठाइयां खाने को मिलेंगी और पटाखे भी ( हां तब क्रेकर्स नाम नहीं जानता था) और आतिशबाजी सिर्फ शादियों में चलती थी, और दीवाली पर पटाखे, ऐसा मुझे लगता था.
अम्मा बोलतीं थी कि दीवाली पर असली पूजा खील-खिलौने ( शक्कर से बने हुये खिलौने) से होती है लेकिन मेरी दीवाली बर्फी वाली थी, हां हाथी घोड़ा वाले खिलौने अच्छे तो बहुत लगते लेकिन रसगुल्ले के सामने उनकी चमक फीकी पड़ जाती थी. वैसे तो हम दशहरे से ही त्योहार के मूड में रहते थे, लेकिन त्योहार की असली रौनक धनतेरस के दिन से भी आती थी. धनतेरस पर बर्तन, सोना चांदी मिलें या ना मिलें लेकिन मुझे खूब सारे पटाखे मिल जायें, बस ये टारगेट रहता था मेरा. दो दिन पहले इसलिये लाना था क्योंकि ये दिमाग में बैठा हुआ था कि अगर एक दिन धूप में नहीं रखेंगे पटाखे तो अच्छे नहीं चलेंगे. बीच में करवाचौथ तो रह ही गया, वैसे तो मेरा तब करवाचौथ से डायरेक्ट कोई लेना देना नहीं था लेकिन करवाचौथ वाले दिन पैदा होने की वजह से ये दिन मुझे तब भी खास लगता था. लेकिन खासियत की शर्त यही थी कि इस दिन के लिये अलग से पटाखे लाये जायें.
सबसे सुनता था कि दीवाली पर नये कपड़े मिलते हैं लेकिन मेरे यहां ऐसा कोई रिवाज नहीं था, कपड़े तो नये हमेशा मिलते थे लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि दीवाली पर कोरे कपड़े पहने हों. हां कोरे मतलब मेरी अम्मा की भाषा में बिल्कुल नये. लेकिन इससे कभी फर्क नहीं पड़ा. फर्क केवल इससे पड़ता था कि पूरे मोहल्ले में पटाखे मेरे पास सबसे ज्यादा होने चाहिये, और अम्मा के साथ मिल कर पापा से ज्यादा रुपये देने की सिफारिश की जाती थी, कुछ रुपये अम्मा अपनी सेविंग से दे देती थीं. और इधर पापा रुपये देकर कोर्ट गये उधर कुछ रुपये मम्मी से झटक लेता था. उस समय झोला ( बैग नहीं) भर कर पटाखे लाने में बादशाह वाली फीलिंग आती थी. इधर पूजा शुरू होती दीवाली की, मेरे दिमाग में पूजा में बैठ कर प्लानिंग चल रही होती कि चरखी पहले चलाएंगे, फिर अनार, बीच बीच में फूलझड़ी ( ये नाम बाद में पता चला पहले कुछ लोग सुसुरिया बोलते तो कुछ छुछुरिया) और बाद में जब सब सो जायेंगे तब बड़े बम चलाएंगे. थोड़े बड़े होने पर अपने आप को तुर्रम खां समझने लगे थे और खुद छोटे होने पर भी अपने से छोटे बच्चों के लिए सांप बनाने वाली टैबलेट जरूर लाते.. उन्हें ऐसे देते जैसे कोई एहसान कर रहे हों उन पर. दीदी को गिन गिन कर देता था जैसे मैं अकेला मालिक हूं सब पटाखों का. रॉकेट के लिये बोतल पहले से ढ़ूंढ़ कर रखते थे, लेकिन मन में सोचता रहता था कि कहीं तिरछा जाकर किसी के घर में ना घुस जाये, एक बार तो बोतल से निकलकर मेरे पीछ ही पड़ गया था.  सब घर में चिल्लाते रहते कि पूजन के बाद दिये रखो, मोमबत्ती जलाओ, दस बार मिन्नतों के बाद लगाई हुई लाइट्स ऑन करो, ये एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल कर बाहर की तरफ दौड़ लगा देते थे, क्योंकि वहां आतिशबाजी प्रदर्शन करने का शौक जो दिमाग में पाल रखा था. 
कुल मिलाकर ये शुद्ध दिखावा था और हमें दिखावा करने में मजा आता था. अम्मा ये मॉनीटर करतीं कि कहीं पड़ोसी ना उठा ले जायें कुछ पटाखे मेरे बैग से. और हम आधे भी नहीं चला पाते वो समेटने लगतीं ये बोलकर अब कल चलाना ( कल फिर दिखावा करना). हम कल तो क्या चार दिन में भी नहीं चला पाते थे पूरे लेकिन मजाल कि किसी और को चलाने को दे दें.
महान आतिशबाजी बनने का फितूर पाले हम घर के अंदर आते तो आंखं में आंसू लाने वाला काजल इंतजार कर रहा होता, जो इस धमकी के साथ लगाया जाता था बड़ा बड़ा कि अगर नहीं लगाया तो अगले जन्म में छछूंदर बनोगे, अगले जन्म का तो कोई डर नहीं लगा कभी , लेकिन घर वालों की बात के सम्मान में झुकना पड़ता था. डिनर कैंसल हो जाता था, क्योंकि अलग अलग मिठाइयों से पेट भरने का टारगेट रहता था. 
जैसे तैसे थक कर सोने जाते तो दो टारगेट रहते थे पहला टारगेट सुबह से पहले तब उठना है जब अम्मा सूप फंटकारती थी ये कहते हुए कि भाग दलुद्दुर ( दरिद्रता) - बैठ लक्ष्मी. अगर नहीं उठ पाया तो जान बूझकर मेरे कान पर आकर बजातीं थीं.. उन्हें जबकि ये खूब पता था कि मुझे सुबह जल्दी उठना है दियों को इकट्ठा करने के लिये. दिये क्या आसपास के बच्चों को सुनकर दिवलियां बोलते थे तब, पहले उन्हें इकट्ठा करते फिर उनका तराजू बनाया जाता, हम सब तराजू में खील खिलौना तौलते जो घर से चुरा कर लाये जाते. तौलने के बाद भी जब कोई खरीददार नहीं मिलता तो खुद ही खा जाते, और खरीददार मिलता भी कैसे जब सबके पास ही अपना माल था.
हां एक दूसरे का बड़ा बड़ा काजल देख कर जरूर हंस लेते थे. क्योंकि मुंह धुल कर कौन आये अगर इसमें समय बर्बाद किया तो मेरे दीपक कोई और ले जायेगा.  दिये को मिट्टी में छुपाकर खेलने का खेल भी खेलते थे. 
ऐसी थी हमारी बचपन की दीपावली........ आपकी कैसी होती थी? 

Thursday, 13 September 2018

ये ना होते तो आज हम गणेशोत्सव नहीं मना रहे होते

नमस्कार दोस्तों,  आज गणेश चतुर्थी है, और घर में गणपति बप्पा विराजमान हो गये हैं,  गणेशोत्‍सव को पूरे उमंग और उल्‍लास के साथ देशभर में मनाया जाता है। मगर क्‍या आप जानते हैं इसको मनाने की परंपरा सबसे पहले कहां से शुरू हुई? आज हम आपको बताते हैं,  गणेश उत्‍सव की शुरुआत सबसे पहले महाराष्‍ट्र से हुई। गणेश चतुर्थी के दिन से इसका आरंभ होता है और फिर 11वें दिन यानी अनंत चतुर्दशी पर गणेश प्रतिमाओं के विसर्जन के साथ इसका समापन होता है।
शिव पुराण में इस बात का उल्‍लेख मिलता है कि इस त्‍योहार को मनाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। भारत के दक्षिण और पश्चिम राज्‍यों में इस त्‍योहार की विशेष धूमधाम रहती है। भारत में जब पेशवाओं का शासन था, तब से वहां गणेश उत्‍सव मनाया जा रहा है। सवाई माधवराव पेशवा के शासन में पूना के प्रसिद्ध शनिवारवाड़ा नामक राजमहल में भव्य गणेशोत्सव मनाया जाता था। जब अंग्रेज भारत आए तो उन्होंने पेशवाओं के राज्यों पर अधिकार कर लिया। तब से वहां इस त्‍योहार की रंगत कुछ फीकी पड़ना शुरू हो गई। लेकिन कोई भी इस परंपरा को बंद नहीं करवा सका,
ऐसे मनाया जाने लगा 11 दिन का उत्‍सव
अब हम बताते हैं कि ये उत्सव 11 दिन का कैसे हो गया,  अंग्रेज सत्‍तासीन होने के बाद हिंदुओं पर पाबंदियां लगाने लगे। इतिहास में बताया गया है कि कुछ शासकों के गलत निर्णयों के चलते हिंदुओं में अपने ही धर्म के प्रति कड़वाहट पैदा हो गई और लोगों में धर्म के प्रति उदासीनता बढ़ती चली गई। उस समय महान क्रांतिकारी व जननेता बाल गंगाधर लोकमान्य तिलक ने सोचा कि हिंदू धर्म को कैसे संगठित किया जाए? लोकमान्य तिलक ने विचार किया कि श्रीगणेश ही एकमात्र ऐसे देवता हैं जो समाज के सभी स्तरों में पूजनीय हैं।
उन्‍होंने हिंदुओं को एकत्र करने के उद्देश्‍य से पुणे में सन 1893 में सार्वजनिक गणेश उत्‍सव की शुरुआत की। तब यह तय किया गया कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी (अनंत चतुर्दशी) तक गणेश उत्सव मनाया जाए और तब से पूरे महाराष्‍ट्र में यह उत्‍सव 11 तक मनाया जाने लगा। उसके बाद देश के बाकी राज्‍यों में भी इस पर्व को धूमधाम से मनाया जाने लगा।
https://youtu.be/zhTWYkR1qyo

Monday, 17 July 2017

दादी मां की यादें

अम्मा(मेरी दादी मां).. पता है आज आपको गये हुये पूरे 5 साल हो गये..बार बार कहता रहा कि मेरे सपने में आ जाओ.. कहां हो, किस हालात में हो? कुछ तो बता जाओ.. मैं ज़िंदा हूं लेकिन जान आपमें अटकी है. लेकिन आपनें कसम खा रखी है ना आने की.. बीवी के सपने में आकर मेरे हाल चाल लेती हो.मेरा ध्यान रखने की बात करती हो.. लेकिन जो बुला रहा है उसके पास नहीं आने की ठीक वैसे ही जिद है आपकी जैसी खाना ना खाने की जिद्द आप तब करती थी घर में जब मां मेरी डांट लगाती थी..अब तो बड़ा हो गया हूं मैं अब मां भी नहीं डांटती हैं अब तो आप मजे से बिना घर वालों पर गुस्सा किये रह सकती थी.. लेकिन नहीं आपको तो बहुत जल्दी थी जाने की.. अरे एक बार आकर तो देखो अब मेरी शादी हो गई है बहुत सपने सजाये थे ना आपने मेरी शादी के, आपकी बहू आ गई है घर पर.. और हां आपको बचपन में वादा किया था ना मैनें बड़ी सी सोने की चैन देने का.. हां अब मैं दे सकता हूं लेकिन किसे दूं?  आपको घर की चौथी पीड़ी देखनी थी दीदी के बेटा भी हो गया है.. सब अच्छा है, सब कुछ तो है लेकिन अब आप ही नहीं हो तो सब कुछ होने के बाद भी कुछ कमी सी लगती है हमेशा.. सच बताऊं आपको.. घर अभी भी जाता हूं मैं, मां पापा का प्यार भी मिलता है लेकिन अब वो मजा नहीं आता घर में आपके बिना..घर के हर कोने में आपको ढूंढता रहता हूं. ऐसे ही यादें ताजा करके मन को बहला लेता हूं. लोग बहुत मैच्योर समझते हैं मुझे तभी याद आने पर साइड में जाकर सुबकता रहता हूं(रोने पर साफ दिल वालों को आजकल लोग कमजोर समझ लेते हैं अम्मा).  अरे जब मेरे पास नहीं रहना था हमेशा तो मुझे इतना प्यार क्यों किया? बताओ? दूसरी दुनिया में जाकर खुश होने का मतलब ये नहीं होता कि आप अपने लकी को भूल जाओ...गुस्सा बहुत हूं मैं आपसे लेकिन आपकी बहुत याद आती है अम्मा..आपके प्यार के आगे गुस्से की कोई अहमियत नहीं.   जिंदगी अधूरी है आपके बिना.. लव यू अम्मा... वापस तो आ जाओ... सीने से लगा जाओ... 😿😿

Tuesday, 4 July 2017

लड़कों की भी विदाई होती है जनाब

लड़कियों के घर छोड़ने पर दुनिया बड़ी बड़ी बातें करती है .प्यार लुटाया जाता है इमोशन का सैलाब आता है .मुझे उससे कोई शिकायत भी नहीं है क्योंकि ये लगाव की वजह से होता है और सबके साथ होता है ,मेरे साथ भी. लेकिन लड़के भी घर छोड़ कर जाते हैं जनाब बल्कि लड़के तो जल्दी घर छोड़ देते हैं क्योंकि पढ़ाई का बीड़ा और बाद में घर संभालने की जिम्मेदारी की वजह से अच्छी नौकरी का प्रेशर..लेकिन उस मां से पूछो जिसने पैदा होने के बाद कभी सपने में भी अपने लाडले को अपने से दूर नहीं  जाने दिया , अपने बेटे को हर पल निहारने में उसे सुकून मिलता था. घर में रह कर बेटा अगर देर शाम कोचिंग से आने में लेट हो जाये तो मां को चैन नहीं आता था जब तक बेटा आ ना जाये. दादी के आंखों का तारा जो रोज उनके साथ सोता था और दुनिया भर की बातें करता था . बाबा जो रोज शाम को अपने पास बैठने को कहते थे.  पापा जो शाम को घर आते ही पूछते थे कि मेरा बेटा नजर नहीं आ रहा है.  उस बेटे को परिवार वाले ना चाहते हुये भी दिल पर पत्थर रखकर बाहर भेज देते हैं.  बेटा कुछ दिन शुरुआत के बहुत मुश्किल से गुजारता है और फिर परदेश में अपना दिल बहलाने की असफल कोशिश करने लगता है.  मैं गारंटी के साथ कह सकता हूं अगर लड़का बिगड़ा हुआ ना हो तो वो हमेशा अपने घर में अपने के बीच ही रहना चाहता है हमेशा.. और जो बिगड़े हुये भी है वो भी कभी कभी तो जरूर बेचैन होते होंगे अपनों के लिये. मुझे याद है कि जब मैं गया था पहली बार घर से बाहर पढ़ने कि लिये तो दादी जाते टाइम अपने आंसू पोछते हुये  खूब प्यार करती थी.  मेरी मां छुप छुप कर रोती थी. पापा अपने आप को जबरदस्ती सख्त दिखाते थे.  और मैं इस वजह से कभी पीछे मुड़कर नहीं देखता था जाते टाइम की अगर घर वालों को देख लिया तो जिन आंसुओं पर मुश्किल से कंट्रोल करके रखा है वो निकल जा़येंगे और मैं कमजोर पड़ जाऊंगा . आज मैं अपने आप को एक दशक से ज्यादा समय से बाहर रहते रहते कुछ  मजबूत कर पाया हूं . शायद घर वालों को भी अब आदत पड़ ही गई होगी मुझसे दूर रहने की.  लेकिन आज भी जब घर जाता हूं तो वापस आने का मन नहीं करता. अब मेरे छोटे भाई लोग बाहर जा रहे हैं अपने भविष्य के बोर्ड पर अपने दिमाग की चॉक से लिखने के लिये.. तो मुझे अपने दिन याद आ रहे हैं. उम्मीद भी उनके बेहतर करने की है और दुआ भी...
लेकिन एक अच्छी बात भी मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं कि घऱ,प्यार,परिवार ,अपनापन, इमोशन सबके जिंदगी में बहुत मायने हैं लेकिन जिंदगी में आगे बढ़ने के लिये लड़कों को अपने आप को मजबूत करके लड़कियों की तरह घर से समय रहते विदा ले लेनी चाहिये..

Monday, 3 July 2017

जून की छुट्टी की हो गई छुट्टी

जून में अक्सर मुझे बचपन की गर्मियों की छुट्टियाँ याद आती हैं. सब बुआ और बच्चे घर आते थे. उसके बाद हम नानी के और मासी के घर जाते थे. मम्मी को बैलेंस बनाना पड़ता था दोनों तरफ बराबर समय देने के लिये.. हमारे मजे थे, पढने की कोई टेंशन नहीं रहती थी. मम्मी रिश्तेदारों के साथ व्यस्त और हम सब बच्चे खेलने में मस्त.  बस गर्मियों की छुट्टियाँ ही तो थी जब हम खूब सारे बच्चे मिलकर खूब मस्ती करते थे. एसी नहीं थे ज्यादा लाइट नहीं थी. लेकिन बचपन की उमंग थी तो आज से ज्यादा खुश थे. अब मेरे पास भी टाइम ज्यादा नहीं है और रिश्तेदारों के पास भी नहीं. मुझे लगता है 2-4 लोगों के अलावा अब रिश्ते भी औपचारिकता रह गये हैं. बाकी सब बड़े होते ही अपनी लाइफ में व्यस्त हो गये हैं. बाकी दूसरों की बात क्या करूं अब तो हालत ये है कि जॉब की वजह से मुझे खुद घर वालों से दूर रहना पड़ रहा है. अभी मां और दीदी आये थे मेरे पास कुछ दिन के लिये. थोड़ा सा गर्मियों की छुट्टी का अहसास दिला कर गये हैं. लेकिन अब घर सूना है. पूरा दिन भांजे के पीछे भागने भागते निकलता था अब मेरे और बीवी के अलावा कोई बात करने वाला भी नहीं. यही हालत तब होती थी जब रिश्तेदार छुट्टी के बाद वापस जाते थे.  लेकिन तब तक मस्ती का पैकेज कंपलीट हो जाता था. आज की तरह नहीं कि बस 4 दिन के लिये आये और वो 4 दिन भी इधर उधर घूमने में निकल गये. पता नहीं लोग क्यों अकेले रहना चाहते हैं अब? पेट की ख़ातिर करने वाली जॉब में भी गर्मियों की छुट्टियाँ सबको मिलनी चाहिये. फिर शायद हम सब जून में एक साथ रह पायें.अब बचपन नहीं है. जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ रहा है. लेकिन फिर भी साथ रहने का मजा कुछ और ही होगा...