जून में अक्सर मुझे बचपन की गर्मियों की छुट्टियाँ याद आती हैं. सब बुआ और बच्चे घर आते थे. उसके बाद हम नानी के और मासी के घर जाते थे. मम्मी को बैलेंस बनाना पड़ता था दोनों तरफ बराबर समय देने के लिये.. हमारे मजे थे, पढने की कोई टेंशन नहीं रहती थी. मम्मी रिश्तेदारों के साथ व्यस्त और हम सब बच्चे खेलने में मस्त. बस गर्मियों की छुट्टियाँ ही तो थी जब हम खूब सारे बच्चे मिलकर खूब मस्ती करते थे. एसी नहीं थे ज्यादा लाइट नहीं थी. लेकिन बचपन की उमंग थी तो आज से ज्यादा खुश थे. अब मेरे पास भी टाइम ज्यादा नहीं है और रिश्तेदारों के पास भी नहीं. मुझे लगता है 2-4 लोगों के अलावा अब रिश्ते भी औपचारिकता रह गये हैं. बाकी सब बड़े होते ही अपनी लाइफ में व्यस्त हो गये हैं. बाकी दूसरों की बात क्या करूं अब तो हालत ये है कि जॉब की वजह से मुझे खुद घर वालों से दूर रहना पड़ रहा है. अभी मां और दीदी आये थे मेरे पास कुछ दिन के लिये. थोड़ा सा गर्मियों की छुट्टी का अहसास दिला कर गये हैं. लेकिन अब घर सूना है. पूरा दिन भांजे के पीछे भागने भागते निकलता था अब मेरे और बीवी के अलावा कोई बात करने वाला भी नहीं. यही हालत तब होती थी जब रिश्तेदार छुट्टी के बाद वापस जाते थे. लेकिन तब तक मस्ती का पैकेज कंपलीट हो जाता था. आज की तरह नहीं कि बस 4 दिन के लिये आये और वो 4 दिन भी इधर उधर घूमने में निकल गये. पता नहीं लोग क्यों अकेले रहना चाहते हैं अब? पेट की ख़ातिर करने वाली जॉब में भी गर्मियों की छुट्टियाँ सबको मिलनी चाहिये. फिर शायद हम सब जून में एक साथ रह पायें.अब बचपन नहीं है. जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ रहा है. लेकिन फिर भी साथ रहने का मजा कुछ और ही होगा...
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