अरे संभल कर कहीं नसेनी ( लकड़ी की सीढ़ी) गिर ना जाये, अच्छा सुनो उसे कुछ खाने को दे देना, बहुत काम पड़ जाता है, सही से करो भैया देखो उस कोने में रह गया, और हां सुनो छींटे जमीन में नहीं गिरने चाहिये, सारा टाइम सफाई में निकल जायेगा तो मिठाई कब बनायेंगे, ये सुनते सुनते ही और घरों की दीवारों पर कलई चूने की सफेद पुताई ( वो दौर पेंट वाला नहीं था) होते होते दीवाली आ जाती थी, मैं सोचता था ये काम कितना आसान है, कितना मजा आता होगा दीवारें रंगने में. लेकिन बाद में सच्चाई पता चली जब बाबा बोले कूंचा (जिससे पुताई होती थी) चलाना बच्चों का खेल नहीं. वर्ना मजदूरों के खाना खाते वक्त कई बार खुद हाथ आजमाने का मन हुआ था..
पुताई के बाद सफाई, ये बिना लिखा हुआ नियम था हर घर में जिसे हर साल फॉलो करना होता था, सफाई क्या, सफाई के नाम पर पुरानी चीजें निकाल कर उन्हें देखने का, आज़माने का और ऊब जाने पर फेंक देने का शौक था, इधर सफाई का टाइम आया और उधर बाहर से आवाज़ आने लगती थी कबाड़ी वाला.... कबाड़ दे दो.... कबाड़ी वाला...
उन्हें भी पता था कि घर-घर में सफाई हो रही है, कबाड़ निकलेगा. सच तो ये है कि कबाड़ हम अपने घरों में जमा करे बैठे थे, हम थे कबाड़ी वाले.. वो तो बेचारा हमारी मदद कर रहा था घर के कबाड़े को निकालने में..
खैर, मम्मी-पापा के दीवाली के अपने टारगेट थे, और हम बस इसलिये खुश होते थे कि खूब सारी मिठाइयां खाने को मिलेंगी और पटाखे भी ( हां तब क्रेकर्स नाम नहीं जानता था) और आतिशबाजी सिर्फ शादियों में चलती थी, और दीवाली पर पटाखे, ऐसा मुझे लगता था.
अम्मा बोलतीं थी कि दीवाली पर असली पूजा खील-खिलौने ( शक्कर से बने हुये खिलौने) से होती है लेकिन मेरी दीवाली बर्फी वाली थी, हां हाथी घोड़ा वाले खिलौने अच्छे तो बहुत लगते लेकिन रसगुल्ले के सामने उनकी चमक फीकी पड़ जाती थी. वैसे तो हम दशहरे से ही त्योहार के मूड में रहते थे, लेकिन त्योहार की असली रौनक धनतेरस के दिन से भी आती थी. धनतेरस पर बर्तन, सोना चांदी मिलें या ना मिलें लेकिन मुझे खूब सारे पटाखे मिल जायें, बस ये टारगेट रहता था मेरा. दो दिन पहले इसलिये लाना था क्योंकि ये दिमाग में बैठा हुआ था कि अगर एक दिन धूप में नहीं रखेंगे पटाखे तो अच्छे नहीं चलेंगे. बीच में करवाचौथ तो रह ही गया, वैसे तो मेरा तब करवाचौथ से डायरेक्ट कोई लेना देना नहीं था लेकिन करवाचौथ वाले दिन पैदा होने की वजह से ये दिन मुझे तब भी खास लगता था. लेकिन खासियत की शर्त यही थी कि इस दिन के लिये अलग से पटाखे लाये जायें.
सबसे सुनता था कि दीवाली पर नये कपड़े मिलते हैं लेकिन मेरे यहां ऐसा कोई रिवाज नहीं था, कपड़े तो नये हमेशा मिलते थे लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ कि दीवाली पर कोरे कपड़े पहने हों. हां कोरे मतलब मेरी अम्मा की भाषा में बिल्कुल नये. लेकिन इससे कभी फर्क नहीं पड़ा. फर्क केवल इससे पड़ता था कि पूरे मोहल्ले में पटाखे मेरे पास सबसे ज्यादा होने चाहिये, और अम्मा के साथ मिल कर पापा से ज्यादा रुपये देने की सिफारिश की जाती थी, कुछ रुपये अम्मा अपनी सेविंग से दे देती थीं. और इधर पापा रुपये देकर कोर्ट गये उधर कुछ रुपये मम्मी से झटक लेता था. उस समय झोला ( बैग नहीं) भर कर पटाखे लाने में बादशाह वाली फीलिंग आती थी. इधर पूजा शुरू होती दीवाली की, मेरे दिमाग में पूजा में बैठ कर प्लानिंग चल रही होती कि चरखी पहले चलाएंगे, फिर अनार, बीच बीच में फूलझड़ी ( ये नाम बाद में पता चला पहले कुछ लोग सुसुरिया बोलते तो कुछ छुछुरिया) और बाद में जब सब सो जायेंगे तब बड़े बम चलाएंगे. थोड़े बड़े होने पर अपने आप को तुर्रम खां समझने लगे थे और खुद छोटे होने पर भी अपने से छोटे बच्चों के लिए सांप बनाने वाली टैबलेट जरूर लाते.. उन्हें ऐसे देते जैसे कोई एहसान कर रहे हों उन पर. दीदी को गिन गिन कर देता था जैसे मैं अकेला मालिक हूं सब पटाखों का. रॉकेट के लिये बोतल पहले से ढ़ूंढ़ कर रखते थे, लेकिन मन में सोचता रहता था कि कहीं तिरछा जाकर किसी के घर में ना घुस जाये, एक बार तो बोतल से निकलकर मेरे पीछ ही पड़ गया था. सब घर में चिल्लाते रहते कि पूजन के बाद दिये रखो, मोमबत्ती जलाओ, दस बार मिन्नतों के बाद लगाई हुई लाइट्स ऑन करो, ये एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल कर बाहर की तरफ दौड़ लगा देते थे, क्योंकि वहां आतिशबाजी प्रदर्शन करने का शौक जो दिमाग में पाल रखा था.
कुल मिलाकर ये शुद्ध दिखावा था और हमें दिखावा करने में मजा आता था. अम्मा ये मॉनीटर करतीं कि कहीं पड़ोसी ना उठा ले जायें कुछ पटाखे मेरे बैग से. और हम आधे भी नहीं चला पाते वो समेटने लगतीं ये बोलकर अब कल चलाना ( कल फिर दिखावा करना). हम कल तो क्या चार दिन में भी नहीं चला पाते थे पूरे लेकिन मजाल कि किसी और को चलाने को दे दें.
महान आतिशबाजी बनने का फितूर पाले हम घर के अंदर आते तो आंखं में आंसू लाने वाला काजल इंतजार कर रहा होता, जो इस धमकी के साथ लगाया जाता था बड़ा बड़ा कि अगर नहीं लगाया तो अगले जन्म में छछूंदर बनोगे, अगले जन्म का तो कोई डर नहीं लगा कभी , लेकिन घर वालों की बात के सम्मान में झुकना पड़ता था. डिनर कैंसल हो जाता था, क्योंकि अलग अलग मिठाइयों से पेट भरने का टारगेट रहता था.
जैसे तैसे थक कर सोने जाते तो दो टारगेट रहते थे पहला टारगेट सुबह से पहले तब उठना है जब अम्मा सूप फंटकारती थी ये कहते हुए कि भाग दलुद्दुर ( दरिद्रता) - बैठ लक्ष्मी. अगर नहीं उठ पाया तो जान बूझकर मेरे कान पर आकर बजातीं थीं.. उन्हें जबकि ये खूब पता था कि मुझे सुबह जल्दी उठना है दियों को इकट्ठा करने के लिये. दिये क्या आसपास के बच्चों को सुनकर दिवलियां बोलते थे तब, पहले उन्हें इकट्ठा करते फिर उनका तराजू बनाया जाता, हम सब तराजू में खील खिलौना तौलते जो घर से चुरा कर लाये जाते. तौलने के बाद भी जब कोई खरीददार नहीं मिलता तो खुद ही खा जाते, और खरीददार मिलता भी कैसे जब सबके पास ही अपना माल था.
हां एक दूसरे का बड़ा बड़ा काजल देख कर जरूर हंस लेते थे. क्योंकि मुंह धुल कर कौन आये अगर इसमें समय बर्बाद किया तो मेरे दीपक कोई और ले जायेगा. दिये को मिट्टी में छुपाकर खेलने का खेल भी खेलते थे.
ऐसी थी हमारी बचपन की दीपावली........ आपकी कैसी होती थी?
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